38 दिन की जंग के बाद भी अधूरे लक्ष्य, सवालों में घिरी रणनीति, पढ़ें एक क्लिक में पूरी खबर

38 दिन की जंग के बाद भी अधूरे लक्ष्य, सवालों में घिरी रणनीति, पढ़ें एक क्लिक में पूरी खबर

ईरान के साथ सीजफायर के बाद डोनाल्ड ट्रंप और उनके सहयोगी इसे अमेरिका की बड़ी जीत बता रहे हैं। बयानबाजी और सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए इस समझौते को ऐतिहासिक सफलता के रूप में पेश किया जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी सेना इस पूरे मामले पर सतर्क नजर आ रही है। सेना के वरिष्ठ अधिकारी इस मुद्दे पर खुलकर जीत का दावा करने से बच रहे हैं, जिससे संकेत मिलता है कि जमीनी स्थिति उतनी आसान नहीं है जितनी बताई जा रही है।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिखा फर्क
रक्षा मंत्री के साथ हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी यह अंतर साफ नजर आया। जहां रक्षा मंत्री ने ट्रंप की जमकर तारीफ की, वहीं सेना के शीर्ष अधिकारी सवालों पर चुप्पी साधते दिखे। उन्होंने जीत से जुड़े सवालों का सीधा जवाब नहीं दिया। इससे यह साफ हो गया कि सेना इस पूरे घटनाक्रम को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं है और किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सावधानी बरत रही है।

क्यों नहीं मान रही सेना इसे जीत
इस जंग में अमेरिका को भारी नुकसान झेलना पड़ा है। कई सैनिक मारे गए और बड़ी संख्या में घायल हुए। इसके अलावा जिन उद्देश्यों के साथ अमेरिका इस संघर्ष में उतरा था, उनमें से कोई भी पूरी तरह हासिल नहीं हो सका। न तो ईरान में सत्ता परिवर्तन हुआ और न ही उसने आत्मसमर्पण किया। इसके उलट अमेरिका पर हमलों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल भी उठे हैं, जिससे उसकी छवि प्रभावित हुई है।

आर्थिक और सैन्य नुकसान
युद्ध के दौरान अमेरिका को भारी आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ा। अरबों डॉलर खर्च करने के बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिले। खाड़ी क्षेत्र में मौजूद सैन्य ठिकानों और संसाधनों को भी नुकसान पहुंचा। इसके अलावा रणनीतिक स्तर पर भी कई फैसलों पर सवाल खड़े हुए, जिससे सेना और सरकार के बीच सोच का अंतर सामने आया।

अधूरे रह गए चार बड़े लक्ष्य
इस संघर्ष की शुरुआत में डोनाल्ड ट्रंप ने चार बड़े उद्देश्य बताए थे—ईरान को कमजोर करना, सत्ता परिवर्तन, मिसाइल क्षमता खत्म करना और तेल ठिकानों पर नियंत्रण। लेकिन 38 दिन की कार्रवाई के बाद भी इनमें से कोई लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं हुआ। यही वजह है कि अमेरिकी सेना इस सीजफायर को जीत मानने से बच रही है।

आगे की रणनीति पर असमंजस
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आगे क्या होगा। ट्रंप प्रशासन के भीतर भी इस बात को लेकर स्पष्टता नहीं दिख रही कि समझौते को आगे बढ़ाया जाए या फिर संघर्ष जारी रखा जाए। ऐसे में सेना कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहती, क्योंकि गलत कदम से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी छवि और प्रभावित हो सकती है।

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