पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस इस समय अपने सबसे बड़े राजनीतिक संकट से गुजरती दिखाई दे रही है। पार्टी के भीतर नेता प्रतिपक्ष के पद को लेकर खुलकर टकराव सामने आ गया है। ममता बनर्जी ने शोभनदेब चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष के लिए चुना है, लेकिन पार्टी के एक बड़े धड़े ने इस फैसले को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने की मांग कर रहे हैं।
60 विधायकों के समर्थन का दावा
बागी गुट का दावा है कि उसके साथ 60 विधायक हैं। जानकारी के मुताबिक स्पीकर को सौंपे गए पत्र पर 58 विधायकों के हस्ताक्षर हैं, जबकि दो अन्य विधायकों के समर्थन का भी दावा किया गया है। विधानसभा चुनाव में टीएमसी के 80 विधायक जीते थे। नियमों के अनुसार अलग गुट की मान्यता के लिए कम से कम 53 विधायकों का समर्थन जरूरी होता है। ऐसे में बागी गुट का दावा पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा सकता है।
ऋतब्रत और संदीपन की भूमिका चर्चा में
मौजूदा संकट की शुरुआत उस समय हुई जब ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को कथित पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निलंबित कर दिया गया। इससे पहले दोनों नेताओं की भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात की खबरें सामने आई थीं। इसके बाद कोलकाता के एक होटल में हुई कथित गुप्त बैठक ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चाओं को जन्म दिया। माना जा रहा है कि उसी दौर से पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा।
क्या बन सकता है नया शक्ति केंद्र?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बागी गुट खुद को पार्टी से अलग घोषित करने के बजाय “असली टीएमसी” के रूप में पेश करने की रणनीति पर काम कर सकता है। यही वजह है कि मौजूदा घटनाक्रम की तुलना महाराष्ट्र की राजनीति में हुए बड़े दल-बदल से की जा रही है। हालांकि अभी तक किसी विधायक ने सार्वजनिक रूप से खुलकर बयान नहीं दिया है, लेकिन विधानसभा में लगातार बढ़ती गतिविधियां संकेत दे रही हैं कि अंदरखाने बड़ा खेल चल रहा है।
ममता के सामने बढ़ी चुनौती
विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवाने के बाद टीएमसी पहले ही दबाव में थी। अब पार्टी के भीतर बढ़ती नाराजगी और नेतृत्व को लेकर उठ रहे सवाल ममता बनर्जी के लिए नई चुनौती बन गए हैं। हालांकि बागी विधायक अभी भी ममता को ही अपना नेता मानने की बात कह रहे हैं, लेकिन नेता प्रतिपक्ष को लेकर उनका रुख पार्टी नेतृत्व से अलग दिखाई दे रहा है।
अब सबकी नजर अगले कदम पर
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बागी गुट वास्तव में जरूरी संख्या बल साबित कर पाएगा। अगर ऐसा होता है तो मामला औपचारिक रूप से स्पीकर के सामने पहुंच सकता है और बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि यह असंतोष केवल दबाव की राजनीति है या फिर टीएमसी के भीतर किसी बड़े राजनीतिक बदलाव की शुरुआत।
