हर साल चैत्र मास में शीतला अष्टमी का पर्व श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है। इस दिन मां शीतला की पूजा की जाती है और उनसे परिवार को बीमारियों से सुरक्षित रखने की प्रार्थना की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि मौसम परिवर्तन के समय कई प्रकार की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है, इसलिए शीतला माता की आराधना कर स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। इस वर्ष शीतला अष्टमी का पर्व 11 मार्च, बुधवार को मनाया जाएगा।
शीतला सप्तमी से शुरू होती है तैयारी
शीतला अष्टमी से एक दिन पहले शीतला सप्तमी मनाई जाती है। इस दिन घरों में विभिन्न प्रकार के पकवान बनाए जाते हैं, जैसे दाल-भात, पूरी, दही, लस्सी और हरी सब्जियां। परंपरा के अनुसार, इन सभी व्यंजनों को अगले दिन ठंडे या बासी रूप में खाया जाता है। शीतला अष्टमी के दिन इन्हीं पकवानों का भोग मां शीतला को अर्पित कर परिवार के सदस्य प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।
इस दिन चूल्हा नहीं जलाने की परंपरा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शीतला अष्टमी के दिन घर में चूल्हा या गैस नहीं जलाया जाता। इसलिए आवश्यक भोजन एक दिन पहले ही तैयार कर लिया जाता है। इस दिन ठंडा और बासी भोजन खाने की परंपरा है, जिसे शरीर को ठंडक देने वाला माना जाता है।
पूजा में इन चीजों का विशेष महत्व
शीतला अष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद मां शीतला के मंदिर जाकर पूजा-अर्चना करनी चाहिए। पूजा के दौरान माता को हल्दी, दही और बाजरा का भोग लगाया जाता है। कई स्थानों पर नीम के पत्तों का भी विशेष महत्व माना जाता है, क्योंकि नीम को स्वास्थ्य के लिए लाभकारी और रोगों से बचाने वाला माना गया है।
स्वच्छता और स्वास्थ्य का संदेश
यह पर्व स्वच्छता और स्वास्थ्य के महत्व को भी दर्शाता है। मान्यता है कि इस दिन के बाद लंबे समय तक बासी भोजन नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए गर्मियों के मौसम में साफ-सफाई, ठंडे पानी और खानपान का विशेष ध्यान रखने की सलाह दी जाती है।
भगवान शिव की पूजा भी शुभ
शीतला अष्टमी के दिन घर में पूजा करने के साथ-साथ शीतला माता के मंदिर जाना शुभ माना जाता है। इसके अलावा भगवान शिव की पूजा का भी विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि श्रद्धा और सच्चे मन से पूजा करने पर मां शीतला की कृपा बनी रहती है और परिवार को रोगों से सुरक्षा मिलती है।
