नवाब की ऐसी शान, महल तक आती थी ट्रेन, UP के रामपुर की कहानी करेगी हैरान, पढ़ें एक क्लिक में

नवाब की ऐसी शान, महल तक आती थी ट्रेन, UP के रामपुर की कहानी करेगी हैरान, पढ़ें एक क्लिक में

आज के दौर में लग्जरी कार और प्राइवेट जेट अमीरी की पहचान माने जाते हैं, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब शाही ठाठ-बाट का अंदाज बिल्कुल अलग हुआ करता था. उत्तर प्रदेश के रामपुर के नवाब ने अपनी शान और रुतबे को दिखाने के लिए ऐसी व्यवस्था करवाई थी, जिसे सुनकर आज भी लोग हैरान रह जाते हैं. उन्होंने अपने सफर के लिए एक निजी ट्रेन तैयार करवाई थी, जो किसी चलते-फिरते महल से कम नहीं थी.

सिर्फ 4 डिब्बों वाली ट्रेन
इस खास ट्रेन का नाम “द सैलून” रखा गया था. आमतौर पर एक ट्रेन में 18 से 24 डिब्बे होते हैं, लेकिन नवाब की ट्रेन में सिर्फ 4 डिब्बे थे. हालांकि इन चार डिब्बों में इतनी सुविधाएं मौजूद थीं कि कोई भी उसे देखकर दंग रह जाए. ट्रेन के अंदर फारसी कालीन बिछे थे, सागवान की लकड़ी का शानदार फर्नीचर था, खूबसूरत पर्दे और झूमर लगाए गए थे. पूरा माहौल किसी राजमहल जैसा दिखाई देता था.

ट्रेन में था चलता-फिरता महल
नवाब हामिद अली खान ने अपनी सुविधा के लिए ट्रेन में शानदार बेडरूम, भोजन कक्ष और पूरी तरह तैयार रसोई बनवाई थी. मनोरंजन के लिए अलग कमरा भी था. इतना ही नहीं, उनके साथ चलने वाले कर्मचारियों जैसे रसोइयों, सुरक्षा कर्मियों और नौकरों के लिए अलग व्यवस्था की गई थी. यह ट्रेन सिर्फ यात्रा का साधन नहीं बल्कि शाही जीवनशैली की मिसाल थी.

महल में था अपना स्टेशन
रामपुर रियासत के नौवें नवाब हामिद अली खान की शान का सबसे बड़ा प्रतीक उनका निजी रेलवे स्टेशन था. बताया जाता है कि उन्होंने अपने महल के भीतर ही स्टेशन बनवाया था, जो मुख्य रेलवे लाइन से जुड़ा हुआ था. मिलक से रामपुर तक करीब 40 किलोमीटर लंबी रेलवे लाइन बिछाई गई थी. इससे ट्रेन सीधे महल के दरवाजे तक पहुंचती थी. उस समय यह व्यवस्था लोगों के लिए किसी अजूबे से कम नहीं थी.

बंटवारे में दिखाई इंसानियत
नवाब सिर्फ अपनी शान के लिए नहीं बल्कि इंसानियत के लिए भी याद किए जाते हैं. साल 1947 के विभाजन के दौरान हालात बेहद खराब थे. उस समय उन्होंने अपनी निजी ट्रेन का इस्तेमाल लोगों की मदद के लिए किया. कई परिवारों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया गया. इस पहल ने उनकी एक अलग पहचान बनाई और लोगों के दिलों में उनके लिए सम्मान बढ़ाया.

समय के साथ खो गई रौनक
नवाब के निधन के बाद यह शाही विरासत धीरे-धीरे इतिहास का हिस्सा बनती चली गई. 1960 के दशक तक वह स्टेशन पूरी तरह वीरान हो गया. जहां कभी शाही हलचल और रौनक हुआ करती थी, वहां सन्नाटा छा गया. लेकिन आज भी रामपुर के नवाब और उनकी शाही ट्रेन का यह किस्सा इतिहास के सबसे दिलचस्प अध्यायों में गिना जाता है.

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