दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में पिछले कुछ दिनों से बारिश देखने को मिली है। इसके बाद लोगों के बीच यह चर्चा शुरू हो गई कि मानसून आ चुका है। हालांकि मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि यह बारिश मानसून की नहीं है। मई के महीने में भीषण गर्मी और हीट डोम जैसी स्थिति के कारण वातावरण में नमी बढ़ी, जिससे बादल बने और कई इलाकों में बारिश हुई। इससे लोगों को गर्मी से राहत जरूर मिली, लेकिन इसे मानसून की शुरुआत नहीं माना जा सकता।
क्या होता है मानसून
मानसून एक ऐसी मौसमी प्रक्रिया है जिसमें अरब सागर से नमी से भरी पश्चिमी हवाएं भारत की ओर बढ़ती हैं और बड़े पैमाने पर बारिश कराती हैं। इसकी शुरुआत आमतौर पर केरल से होती है। इसके बाद धीरे-धीरे मानसून पूरे देश में फैलता है। यह प्रक्रिया करीब चार महीने तक चलती है और देश की खेती, जल संसाधनों और अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
कैसे होता है ऐलान
मौसम विभाग किसी भी बारिश को मानसून नहीं मानता। मानसून घोषित करने के लिए कुछ तय मानकों का पूरा होना जरूरी होता है। केरल के अधिकांश मौसम केंद्रों पर लगातार बारिश, अरब सागर के ऊपर पर्याप्त गति से पश्चिमी हवाओं का चलना और पर्याप्त बादलों की मौजूदगी जरूरी होती है। फिलहाल केरल में बारिश और बादल तो मौजूद हैं, लेकिन पश्चिमी हवाएं अभी भी कमजोर बनी हुई हैं। यही वजह है कि मानसून के आगमन का आधिकारिक ऐलान नहीं किया गया है।
बार-बार बदली तारीख
मौसम विभाग ने पहले अनुमान लगाया था कि मानसून 26 मई तक केरल पहुंच जाएगा। बाद में यह तारीख 28 मई और फिर 1 जून तक बढ़ाई गई। अब विभाग का कहना है कि 3 जून से पहले मानसून केरल पहुंचने की संभावना कम है। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मानसून 8 जून तक भी केरल पहुंच जाता है तो इसे बहुत ज्यादा देरी नहीं माना जाएगा। इसके बाद जुलाई के पहले सप्ताह तक मानसून पूरे देश में फैल सकता है।
चक्रवात बना बड़ी वजह
बंगाल की खाड़ी में बने चक्रवाती सिस्टम ने भी मानसून की रफ्तार को प्रभावित किया है। इस वजह से पूर्वी भारत में बारिश हुई और कई राज्यों में तेज हवाएं चलीं। हालांकि इसी कारण पश्चिमी हवाएं कमजोर पड़ गईं, जिससे मानसून की प्रगति धीमी हो गई। मौसम विभाग का मानना है कि आने वाले दिनों में हवाओं की गति बढ़ सकती है, जिससे मानसून को आगे बढ़ने में मदद मिलेगी।
अल नीनो से बढ़ी चिंता
मौसम वैज्ञानिकों को इस साल अल नीनो की संभावना भी चिंता में डाल रही है। अल नीनो की स्थिति में प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है, जिसका असर भारत की बारिश पर पड़ता है। इससे मानसून कमजोर हो सकता है और कई क्षेत्रों में सामान्य से कम वर्षा हो सकती है। भारत की बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है और लाखों किसान मानसून की बारिश का इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में मानसून की देरी और अल नीनो की आशंका दोनों ही चिंता का विषय बनी हुई हैं।
