जगदीप धनखड़ ने सोमवार को अचानक उपराष्ट्रपति के पद से इस्तीफा दे दिया। इस बात पर सियासी गलियारे में चर्चाएं तेज हो गई। स्वास्थ्य कारणों से धनखड़ के इस्तीफे की बात इसलिए गले से नहीं उतरती क्योंकि करीब एक महीने पहले उत्तराखंड में एक कार्यक्रम में उनकी तबीयत खराब हुई थी। राजभवन में डॉक्टरों ने उनका इलाज किया और अगले ही दिन वह एक स्कूल के कार्यक्रम में शामिल हुए।
धनखड़ ने सोमवार को अचानक अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने स्वास्थ्य कारणों का हवाला दिया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस पर संदेह जताया जा रहा है। उनकी तबीयत जरूर एक महीने पहले उत्तराखंड में खराब हुई थी, लेकिन अगले ही दिन वे कार्यक्रम में शामिल हो गए थे और तब से लगातार सक्रिय थे। कयास तो इस पर भी लग रहे हैं कि धनखड़ के इस्तीफे के कई घंटे बीतने के बाद भी प्रधानमंत्री या किसी केंद्रीय मंत्री ने कोई ट्वीट तक नहीं किया। कयास इसलिए भी लग रहे हैं क्योंकि 15 दिन भी नहीं हुए जब उन्होंने अपने रिटायरमेंट प्लान की चर्चा की थी। 10 जुलाई को जेएनयू में एक कार्यक्रम में उन्होंने स्पष्ट कहा था कि उपराष्ट्रपति का कार्यकाल खत्म होने के बाद वे रिटायर हो जाएंगे। फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि उन्होंने बीच में ही पद छोड़ने की घोषणा कर दी। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह केवल सेहत का मामला है या इसके पीछे कोई बड़ी सियासी वजह छिपी है?
कुछ लोगों ने तो इसे आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के उस बयान से भी जोड़ा जिसमें उन्होंने 75 साल की उम्र के बाद राजनीति से संन्यास लेने की बात कही थी। लेकिन धनखड़ अभी 74 के हैं और बीजेपी में उनसे वरिष्ठ कई नेता हैं जो 75 पार कर चुके हैं। इसलिए यह कारण तर्कसंगत नहीं लगता।
क्या बिहार चुनाव की तैयारी है?
उपराष्ट्रपति के इस्तीफे को बिहार चुनाव से भी सीधे नहीं जोड़ा जा सकता। जगदीप धनखड़ जिस समुदाय से आते हैं, उसका बिहार में वजूद ही नहीं है। इसलिए उनके इस्तीफे से किसी को खुश या नाराज करने का सवाल नहीं उठता। कहीं ऐसा तो नहीं कि धनखड़ की जगह किसी और को उपराष्ट्रपति बनाकर बीजेपी बिहार में अपना सियासी हित साधने की योजना बना रही हो। सोशल मीडिया पर जिस तरह राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश को अगला उपराष्ट्रपति बनाने की चर्चा चल रही है, उससे इस तर्क में दम लगता है। लेकिन हरिवंश बीजेपी में नहीं हैं। वे जेडीयू के कोटे से राज्यसभा पहुंचे हैं। सवाल है कि क्या सहयोगी दल के नेता को उपराष्ट्रपति बनाने के लिए बीजेपी अपने वरिष्ठ नेता की बलि ले सकती है। वो भी तब जबकि वह बिहार में गठबंधन की जूनियर पार्टनर है।
विपक्ष के आरोप और सरकार की चुप्पी
विपक्ष का कहना है कि धनखड़ हाल में सरकार के रवैये से नाराज थे। कुछ सांसदों ने कहा कि वे “ऑपरेशन सिंदूर” और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा पर महाभियोग से जुड़े बयानों के कारण दबाव में थे। वहीं, बीजेपी की ओर से जेपी नड्डा के राज्यसभा में दिए बयान को लेकर भी विवाद हुआ, जिसे धनखड़ का अपमान बताया गया। हालांकि, नड्डा ने सफाई भी दी, और सरकार की तरफ से अब तक कोई स्पष्ट बयान नहीं आया है।
आगे क्या होगा?
बहरहाल, सवाल है कि अब क्या होगा। उपराष्ट्रपति का पद संवैधानिक है। संविधान के तहत उपराष्ट्रपति राज्यसभा का सभापति होता है। संविधान में उपराष्ट्रपति से संबंधित केवल एक प्रावधान है, जो राज्यसभा के सभापति के रूप में उनके कार्य से जुड़ा है। अगर यह पद ख़ाली हो जाता है, तो यह काम राज्यसभा का उपसभापति या कोई अन्य सदस्य करता है, जिसे भारत के राष्ट्रपति ने अधिकृत किया हो।
