पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले विपक्षी गठबंधन INDIA की एकता पर सवाल खड़े होने लगे हैं। केंद्र में साथ दिखने वाले दल राज्य की राजनीति में अलग-अलग राह पर चलते नजर आ रहे हैं। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच दूरी साफ दिख रही है। कांग्रेस जहां केंद्र में गठबंधन की बात करती है, वहीं बंगाल में वह ममता बनर्जी के खिलाफ सीधे मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। इससे साफ संकेत मिल रहा है कि राज्य चुनावों में गठबंधन की एकजुटता कमजोर पड़ जाती है।
अल्पसंख्यक वोट पर सियासी जंग
बंगाल के मुस्लिम बहुल इलाकों में सियासी मुकाबला और दिलचस्प हो गया है। ममता बनर्जी के मजबूत वोटबैंक में सेंध लगाने के लिए कई दल सक्रिय हो गए हैं। लेफ्ट पार्टियां पहले से ही मैदान में हैं, वहीं असदुद्दीन ओवैसी भी अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में हैं। ऐसे में कांग्रेस ने मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तरी दिनाजपुर और पुरुलिया जैसे इलाकों पर खास फोकस किया है। पार्टी यहां अपनी पकड़ मजबूत कर सीटों की संख्या बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है।
कांग्रेस का आक्रामक प्रचार अभियान
चुनाव प्रचार अब तेजी पकड़ चुका है और कांग्रेस ने बड़े नेताओं को मैदान में उतारने की योजना बनाई है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा की कई रैलियां प्रस्तावित हैं, जो चुनावी माहौल को और गर्म करेंगी। इसके अलावा मल्लिकार्जुन खरगे भी दलित और आदिवासी बहुल क्षेत्रों में सभाएं करेंगे। कांग्रेस का मकसद साफ है कि वह बंगाल में अपनी खोई जमीन वापस हासिल करे और टीएमसी के दबदबे को चुनौती दे।
चार बड़े मुद्दों पर कांग्रेस का फोकस
कांग्रेस ने चुनाव के लिए चार बड़े मुद्दे तय किए हैं, जिनमें कानून व्यवस्था, भ्रष्टाचार, महंगाई और केंद्र से बकाया राशि शामिल हैं। पार्टी का आरोप है कि राज्य और केंद्र दोनों सरकारें इन मुद्दों पर जनता को निराश कर रही हैं। साथ ही कांग्रेस टीएमसी और बीजेपी के बीच कथित मिलीभगत का मुद्दा भी उठा रही है। यह रणनीति ममता बनर्जी के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकती है और उनके वोटबैंक पर असर डाल सकती है।
भविष्य में बढ़ सकती है दूरी
लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस और टीएमसी ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था, लेकिन तब टकराव इतना खुलकर सामने नहीं आया था। इस बार कांग्रेस की आक्रामक रणनीति दोनों दलों के रिश्तों में खटास ला सकती है। बंगाल का यह चुनाव सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं बल्कि विपक्षी एकता की असली परीक्षा भी बन गया है, जहां हर दल अपने राजनीतिक हित को प्राथमिकता देता नजर आ रहा है।
