आज कान्स फिल्म फेस्टिवल का नाम आते ही लोगों के दिमाग में रेड कार्पेट, महंगी ड्रेस और बड़े सितारों की तस्वीर उभरती है। चर्चा होती है कि कौन पहुंचा, किसने क्या पहना और किसका लुक वायरल हुआ। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि कान्स की शुरुआत सिर्फ ग्लैमर दिखाने के लिए नहीं हुई थी। इसका जन्म सिनेमा की आजादी और फासीवादी दखल के विरोध से जुड़ा हुआ है। इसकी कहानी जितनी पुरानी है उतनी ही दिलचस्प भी है।
हिटलर से जुड़ा किस्सा
साल 1937 में दुनिया में वेनिस फिल्म समारोह का दबदबा था। आरोप लगे कि तानाशाह मुसोलिनी और हिटलर ने पुरस्कारों में हस्तक्षेप किया और जूरी के फैसलों पर दबाव बनाया। कहा गया कि नियम बदलकर पसंदीदा फिल्म को सम्मान दिया गया। इस विवाद के बाद कई फिल्मकार नाराज हुए। फिर फ्रांस ने अलग रास्ता चुना और एक नए अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह की नींव रखी। यहीं से कान्स की कहानी शुरू हुई।
भारत ने ऐसे दी दस्तक
भारत और कान्स का रिश्ता भी बेहद पुराना रहा है। आजादी से पहले चेतन आनंद की फिल्म नीचा नगर पहली भारतीय फिल्म बनी जिसने वहां दस्तक दी। यह फिल्म अमीरी और गरीबी की खाई पर आधारित थी। इसके बाद बिमल रॉय की दो बीघा जमीन ने अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई। भारतीय यथार्थवादी सिनेमा ने दुनिया को दिखाया कि यहां सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि समाज की सच्चाइयों को भी पर्दे पर उतारा जाता है।
दुनिया में बजा भारत का डंका
इसके बाद लगातार कई भारतीय फिल्मों ने कान्स में पहचान बनाई। बूट पॉलिश, पाथेर पांचाली और दूसरी फिल्मों ने भारत को मजबूत पहचान दिलाई। बेबी नाज को पुरस्कार मिला तो पाथेर पांचाली को मानवतावादी फिल्म का सम्मान मिला। यह वह दौर था जब राज कपूर, देव आनंद और सत्यजित राय जैसे फिल्मकार दुनिया में भारत की नई छवि बना रहे थे और भारतीय सिनेमा को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा रहे थे।
फिर बदली पूरी तस्वीर
समय के साथ फिल्मों का स्वरूप बदला और स्टार कल्चर तेजी से बढ़ने लगा। धीरे धीरे फिल्मों की चर्चा से ज्यादा सितारों की चर्चा होने लगी। हीरोइनों की पोशाकें और रेड कार्पेट की तस्वीरें खबरों की सुर्खियां बनने लगीं। सिनेमा के सामाजिक सरोकार पीछे जाते दिखे और ग्लैमर ने ज्यादा जगह घेर ली। आज कान्स में फिल्मों से ज्यादा फैशन की चर्चा होना आम बात बन गई है।
आज भी जारी है सफर
हालांकि इसके बावजूद कान्स में भारतीय फिल्मों की मौजूदगी लगातार बनी हुई है। मसान, मंटो, लंच बॉक्स और दूसरी फिल्मों ने अपनी छाप छोड़ी। इस बार भी भारतीय फिल्में और कलाकार वहां पहुंचे हैं। सबसे खास बात यह है कि पायल कपाड़िया जैसी भारतीय फिल्मकार बड़ी भूमिका निभा रही हैं। यानी रेड कार्पेट की चमक के पीछे आज भी सिनेमा की असली कहानी सांस ले रही है।
